झूठ भी है, सच भी है /Ankit AKP

झूठ भी है, सच भी है
बस फर्क इतना सा है कि झूठ सच को छिपाता है, और  सच झूठ को दिखाता है !
और हाँ......हर झूठ के पीछे एक सच तो होता ही है लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि सच के पीछे भी एक झूठ हो;
झूठ को भले सच का सहारा लेना पड़ता हो लेकिन सच को झूठ का सहारा नहीं होता ,अगर कोई बात है जो झूठ है मतलब उसके पीछे कोई ना कोई तो सच्चाई है लेकिन हम हर झूठ को नहीं मान सकते कि इस झूठ में भी कोई सच छुपा रखा है क्योंकि कुछ झूठ तो सिर्फ झूठ होते हैं ज़िनमे ना कोई सच्चाई होती है और ना कोई बात होती है, ये झूठ तो बस ऐसे ही स्थान ले लेते हैं ज़िन्हे हम खुद ही बनाते हैं !
झूठ को बुरा कहें या सच को अच्छा कहें, यह तोह आप लोगो की अपनी आपनी सोच है ,बस इतना कहना चाहूँगा कि हर झूठ सच को छूपाने के लिये नहीं होता,कुछ झूठ किसी की परवाह का एहसास दिलाने ,किसी को खुश करने ,किसी को दुख ना देने के लिये भी सच को छूपा लेना चाहिए ,इसमें सच भी झूठ बन जाये तोह क्या झूठ !
झूठ वैसे भी निष्पक्ष होता है, ऐसा नहीं कि वह झूठ की तरह कहीं भी और किसी भी पक्ष में जगह ले लेता हो |
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